अरुणेश, हिसार कपास की फसल में लगने वाली सूंडी को रोकने में भले ही बीटी ने कामयाबी प्राप्त कर ली है, लेकिन इससे पशुओं और किसानों पर कुप्रभावों को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। कृषि विशेषज्ञों ने हाल ही में कई जिलों में पशुओं के मरने का कारण बीटी काटन बताया है। दूसरी ओर इन आरोपों को हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय का अनुसंधान विभाग सिरे से नकार रहा है। प्रदेश में इन दिनों 4.18 लाख हेक्टेयर भूमि में कपास की खेती की जाती है। लगभग पांच वर्ष पूर्व कपास की फसल पर अमेरिकन सूंडी के प्रकोप ने इस प्रकार कहर बरपाया था कि कपास की फसल पूरी तरह चौपट हो गई थी। इस दौरान हाइब्रिड बीटी का पदार्पण भारत में हुआ और गुजरात, महाराष्ट्र सहित कुछेक राज्यों में किसानों ने चोरी छुपे बीटी खेती शुरू कर दी। इस बीच कई मल्टी नेशनल कंपनियों ने प्रदेश सरकार से बीटी की अनुमति देने की मांग कर दी। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान केंद्र सहित प्रदेश में कुछेक स्थानों पर परीक्षण के तौर पर अलग-अलग कंपनियों द्वारा तैयार की गई बीटी का परीक्षण किया गया। परीक्षण की रिपोर्ट और भारत सरकार की परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर तीन वर्ष पहले अधिकारिक रूप में में बीटी काटन की अनुमति प्रदेश सरकार ने दी थी। अब यह 85 प्रतिशत रकबे में इसकी बिजाई की जाती है। इसके साथ-साथ प्रदेश में बीटी काटन बेचने वाली कंपनियों की संख्या 60 तक पहुंच गई है। बीटी काटन की खेती का विरोध कर रहे किसान बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक डा. सुधीर कौड़ा ने अपनी मुहिम को तेज कर दिया है। उनका तर्क है कि बीटी काटन के खल व बिनौले को किसान पशुओं को खिलाते हैं। ऐसा होने के कारण पशुओं के ऊपर कुप्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। इसके चलते पशुओं में बांझपन, बच्चादानी व गर्भ न ठहरने, कमजोरी, एलर्जी, खुजली, चारा न खाने तथा दूध की मात्रा व गुणवत्ता में गिरावट संबंधी समस्या आसानी से देखी जा सकती है। इन दावों के बीच योगाचार्य स्वामी रामदेव के गुरु आचार्य बलदेव ने अपने जींद स्थित गौशाला में बीटी काटन के खल और बिनौले के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी है। इतना ही उनके इस फैसले की जानकारी मिलने पर प्रदेश के हिसार सहित कई गौशाला में पशुओं को बीटी का खल व बिनौला खिलाना बंद कर दिया गया है। यह है बीटी यह एक जीन का नाम है, जो पारंपरिक काटन के बीच में बायो तकनीक के जरिये बैसिलस थूरीनजैनसिस वायरस का जीन डालकर तैयार किया जाता है। ऐसा होने के कारण कपास को नुकसान पहुंचाने वाले सूंडी अमेरिकन सूंडी की मौत हो जाती है। यह कहते हैं वैज्ञानिक हकृवि अनुसंधान निदेशक डा. बीएस छिल्लर का कहना है कि अब तक उनके पास कोई लिखित शिकायत किसी किसान की ओर से नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं आई है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि यह पशुओं के लिये घातक है। हकृवि के कई वैज्ञानिक भी कर रहे हैं विरोध बीटी काटन के जहरीले होने का आरोप लगाते हुए हकृवि के कई वैज्ञानिकों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया है। विरोध करने वालों में प्लांट ब्रीडिंग विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं शिक्षक संघ के पूर्व प्रधान डा. महाबीर सिंह नरवाल, वेटनरी माइक्रोबाइलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. जगबीर रावत, डा. जिले राणा शामिल हैं।
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